तस्मै प्राच्यां दिशोऽन्तर्देशाऽऽवमिष्वा- समन् ु ष् ठातार-मकर्वन् ॥ १ ॥
For that Vratya, lover and benefactor of humanity, the Devas, from the intermediate direction of the eastern quarter, made Bhava, creative and regenerative spirit of nature's causation, wielder of the bow and arrow against pure negativity, the agent of his will and command.
उस राजा इक्ष्वाकु के लिए पूर्व दिशा में, देश की सीमाओं तक, देवताओं ने एक यज्ञ का आयोजन किया।
Kanda 15 · Verse 1
स ध्रुवां दिशमनु व्यचलत्॥ १ ॥
Sa dhruvāṁ diśamanu vyacalát.
वह निश्चित दिशा की ओर चला।
Kanda 15 · Verse 1
स महिमा सद्रुभूत्वान्तं पृथिव्या समुद्रोऽभवत् ॥ १ ॥
Sa mahimā sadrurbhūtvāntaṁ pṛthivyā cchatsa samudro'bhavat.
यह श्लोक कहता है कि पृथ्वी की महिमा और समृद्धि के अंत तक समुद्र का विस्तार हुआ। यह सृष्टि की विशालता और प्रकृति की असीम शक्ति को दर्शाता है।
Kanda 15 · Verse 1
सो ऽ रज्यत ततो राज्ञ्यो ऽ स्य जायत॥ १ ॥
He became attached, and from him, queens were born.
वह राजा उस रानी के प्रति आसक्त हो गया, और उससे उसे संतान उत्पन्न हुई।
Kanda 15 · Verse 1
तद्यस्यैवं विद्वान्-व्रत्यो राज्ञोऽतिथिर्ग्गृह्णानाच्छेत् ॥ १ ॥
The wise and disciplined king should receive such a guest with honor.
जो विद्वान और व्रत का पालन करने वाला राजा, अतिथि का सत्कार करता है, वह महान फल प्राप्त करता है। यह श्लोक अतिथि सत्कार के महत्व को बताता है। ऐसा राजा स्वर्ग को प्राप्त करता है।
उस व्रात्य (ब्रह्मचारी) की, जिसका यह प्रथम प्राण है, वही यह पृथ्वी है।
Kanda 15 · Verse 2
तं बृहच्च रथन्तरं चादित्याश्च विश्वे च देवा अनुव्य चलन् ॥ २ ॥
The great and Rathantara Sama hymns, along with the Adityas and the Vishve Devas, followed Him.
यह श्लोक कहता है कि सूर्य, बृहत् और रथन्तर सामवेद के मंत्रों के साथ-साथ विश्वेदेवा (सभी देवता) भी उस दिव्य शक्ति का अनुसरण करते हैं। यह उस परम सत्ता की सर्वव्यापीता और महिमा को दर्शाता है।
Kanda 15 · Verse 2
वासन्तौ मासौ गोप्ता-राव-कुर्व-न्-बृहच्च र-थन्त-रं चानु-ष्ठा-तारौ ॥ २ ॥
The Devas made the two spring months his security guards, and Brhat and Rathan-tara Samans, his assistants to carry out his will and command.
यह श्लोक बताता है कि वसंत ऋतु के दो महीने (चैत्र और वैशाख) गोप्ता (रक्षक) के समान हैं, जो बृहत् और रथन्तर नामक सामवेदीय स्तोत्रों का अनुष्ठान करने वाले हैं। ये महीने यज्ञों और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए अत्यंत शुभ माने जाते हैं।
Kanda 15 · Verse 2
वासन्तौ मासौ गोप्ता-राव-कुर्व-न्-बृहच्च र-थन्त-रं चानु-ष्ठा-तारौ ॥ २ ॥
The Devas made the two spring months his security guards, and Brhat and Rathan-tara Samans, his assistants to carry out his will and command.
यह श्लोक बताता है कि वसंत ऋतु के दो महीने (चैत्र और वैशाख) गोप्ता (रक्षक) के समान हैं, जो बृहत् और रथन्तर नामक सामवेदीय स्तोत्रों का अनुष्ठान करने वाले हैं। ये महीने यज्ञों और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए अत्यंत शुभ माने जाते हैं।
Kanda 15 · Verse 2
भव एनमिष्वसः प्राच्यां दिशोऽन्तर्देशा- नु ष् ठात ृ ान् तिष्ठति नैनं शर्वो न भवो नेशानः ॥ २ ॥
यह श्लोक कहता है कि जो व्यक्ति सत्यनिष्ठ और निष्पाप है, वह पूर्व दिशा में स्थित सभी देशों में निर्भय होकर विचरण करता है। उसे न तो शिव, न ही विष्णु, और न ही कोई अन्य देवता रोक सकते हैं।
Kanda 15 · Verse 2
तं भूमिश्चाग्निശ്ചौषधयश्च वनस्पतीयश्च वानस्पत्याश्च वीरुधश्चानुव्य…लन्॥ २ ॥
यह श्लोक बताता है कि पृथ्वी, अग्नि, औषधियाँ, वनस्पति, वृक्ष और लताएँ सभी उस परम तत्व से ही उत्पन्न होती हैं और उसी में विलीन हो जाती हैं। यह सृष्टि की एकता और उस परम सत्ता पर निर्भरता को दर्शाता है।
Kanda 15 · Verse 2
तं प्रजापतिश्च परमेष्ठी च पिता च पितामहश्च श्रद्धा च वर्षां भूत्वानुव्य वर्तयन्त ॥ २ ॥
Tam prajāpatiśca parameṣṭhī ca pitā cā pitāmahasca śraddhā ca varṣaṁ bhūtvānuvya vartayanta.
यह श्लोक बताता है कि प्रजापति, परमेष्ठी, पिता, पितामह और श्रद्धा, ये सभी मिलकर वर्षा बनकर संसार का पालन करते हैं। वे ही सृष्टि के रचयिता और पालक हैं, जो जीवन को बनाए रखते हैं।
Kanda 15 · Verse 2
श्रेयांसमेनमत्मानौ मानयेत् तथा क्षत्रा य ना वृश्चते ॥ २ ॥
One should honor this self as the highest, just as one honors a king, for the self is not cut or diminished.
यह श्लोक कहता है कि मनुष्य को अपने आत्म-सम्मान को बनाए रखना चाहिए और किसी भी परिस्थिति में अपने सम्मान को नहीं खोना चाहिए, क्योंकि आत्म-सम्मान ही सबसे बड़ा धन है।
Kanda 15 · Verse 3
वासन्ता-वेनं मासौ प्राच्यां दिशो गोपा-यतो बृ-हच्च र-थन्त-रं चानु तिष्ठ-तो य एवं वेद ॥ ३ ॥
The two spring months, from the eastern quarter protect him, and Brhat and Rathan-tara Samans fulfil his wish and will, whoever knows this.
यह श्लोक बताता है कि वसंत ऋतु के दो महीने पूर्व दिशा में गायन करते हुए आते हैं, और बृहत् तथा रथन्तर सामवेद भी उनका अनुसरण करते हैं। जो इस सत्य को जानता है, वह इन आध्यात्मिक सत्यों का अनुभव करता है।
Kanda 15 · Verse 3
भूमेश्च वै सोऽग्नेश्चौषधीनां च वनस्पतीनां च वान- स्पत्यानां च वीरुधां च प्रियं धर्मं भवति य एवं वेद॥ ३ ॥
Bhūmeśca vai so'gneścauṣadhīnāṁ ca vanaspatīnāṁ ca vāna- spatyānāṁ ca vīruddhāṁ ca priyaṁ dhāma bhavati ya evaṁ veda.
जो मनुष्य पृथ्वी, अग्नि, औषधियों, वनस्पति, महान वृक्षों और लताओं के प्रिय धर्म को इस प्रकार जानता है, वह वास्तव में ज्ञानी है। यह ज्ञान उसे प्रकृति के साथ एकात्मता का अनुभव कराता है।
Kanda 15 · Verse 4
स ऊर्ध्वां दिशमनु व्यचलत्॥ ४ ॥
Sa ūrdhvāṁ diśamanu vyacalát.
वह ऊपर की दिशा की ओर चला गया। ॥ ४ ॥
Kanda 15 · Verse 5
तमृतं च सत्यं च सूर्यश्च चन्द्रश्च नक्षत्राणि…नुव्य…लन्॥ ५ ॥
Tamṛtaṁ ca satyaṁ ca sūryaśca candraśca nakṣatrāṇi cānuvya calan.
यह श्लोक बताता है कि अमृत, सत्य, सूर्य, चंद्रमा और नक्षत्र सभी एक ही परम सत्य के विभिन्न रूप हैं। ये सभी उस दिव्य प्रकाश से प्रकाशित होते हैं जो सभी को जीवन और ज्ञान प्रदान करता है।